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भारत में कागजी मुद्रा का इतिहास: 250 साल में कैसे बदला नोटों का स्वरूप, जानिए पूरी कहानी

by newzgossip
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भारत में कागजी मुद्रा का इतिहास: 250 साल में कैसे बदला नोटों का स्वरूप, जानिए पूरी कहानी
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भारत में कागजी मुद्रा का इतिहास करीब ढाई सौ साल पुराना माना जाता है। आज हमारी जेब में मौजूद नोटों तक पहुंचने का सफर निजी बैंकों से शुरू होकर भारतीय रिजर्व बैंक और आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था तक पहुंचा है। शुरुआती दौर में निजी बैंक अपने वादापत्र के रूप में नोट जारी करते थे, जबकि बाद में ब्रिटिश शासन ने नोट जारी करने का अधिकार अपने नियंत्रण में ले लिया। आजादी के बाद भारतीय मुद्रा ने नए प्रतीकों और महात्मा गांधी की तस्वीर के साथ एक अलग पहचान बनाई।

1770 में हुई शुरुआती कागजी नोटों की शुरुआत

भारत में शुरुआती कागजी नोट जारी करने का श्रेय कोलकाता में 1770 में स्थापित बैंक ऑफ हिंदुस्तान को दिया जाता है। उस समय देश में सिक्कों का चलन था, लेकिन व्यापार और बैंकिंग गतिविधियों के विस्तार के साथ कागजी मुद्रा का इस्तेमाल भी बढ़ने लगा। हालांकि, शुरुआती नोट आज की तरह सरकार की ओर से जारी कानूनी मुद्रा नहीं थे। इनका इस्तेमाल मुख्य रूप से बैंक के भुगतान संबंधी वादापत्र के रूप में किया जाता था।

ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में जनरल बैंक ऑफ बंगाल एंड बिहार और बंगाल बैंक जैसे संस्थानों ने भी नोट जारी किए। इन नोटों का इस्तेमाल सीमित क्षेत्रों और व्यापारिक गतिविधियों तक ही था।

प्रेसीडेंसी बैंकों ने बढ़ाया कागजी मुद्रा का चलन

भारत में कागजी नोटों के प्रसार में प्रेसीडेंसी बैंकों की अहम भूमिका रही। बैंक ऑफ बंगाल की स्थापना 1806 में हुई, जबकि बैंक ऑफ बॉम्बे और बैंक ऑफ मद्रास क्रमशः 1840 और 1843 में स्थापित हुए।

इन बैंकों द्वारा जारी किए गए नोट व्यापारिक लेनदेन में इस्तेमाल किए जाते थे। उस दौर के नोटों पर ब्रिटिश शासन और व्यापार से जुड़े प्रतीक देखने को मिलते थे। हालांकि, अलग-अलग बैंकों के नोटों की स्वीकार्यता और उपयोग का दायरा सीमित था।

1861 में सरकार ने अपने नियंत्रण में लिया नोट जारी करने का अधिकार

भारत में कागजी मुद्रा के इतिहास में 1861 का वर्ष महत्वपूर्ण माना जाता है। ब्रिटिश शासन ने पेपर करेंसी एक्ट, 1861 के जरिए नोट जारी करने का अधिकार अपने नियंत्रण में ले लिया। इसके बाद निजी बैंकों की स्वतंत्र रूप से नोट जारी करने की व्यवस्था समाप्त हो गई।

सरकारी नोटों पर महारानी विक्टोरिया की तस्वीर भी दिखाई दी। शुरुआती दौर में जालसाजी और सुरक्षा संबंधी जोखिमों से निपटने के लिए विशेष तरीके अपनाए जाते थे। कुछ नोटों के दो हिस्से अलग-अलग डाक से भेजे जाते थे, ताकि दोनों हिस्सों के मिलान के बाद ही भुगतान किया जा सके।

1938 में रिजर्व बैंक ने जारी किया पहला नोट

भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना 1 अप्रैल 1935 को हुई थी। इसके बाद 1 जनवरी 1938 को रिजर्व बैंक ने अपना पहला बैंक नोट जारी किया। यह पांच रुपये का नोट था, जिस पर तत्कालीन ब्रिटिश सम्राट किंग जॉर्ज षष्ठम की तस्वीर छपी थी।

इसी वर्ष 10 रुपये, 100 रुपये, 1,000 रुपये और 10,000 रुपये के नोट भी जारी किए गए। उस समय रिजर्व बैंक के पहले गवर्नर सर ऑस्बोर्न स्मिथ थे, जबकि पांच रुपये के पहले नोट पर उनके उत्तराधिकारी सर जेम्स टेलर के हस्ताक्षर थे।

आजादी के बाद भारतीय नोटों को मिली नई पहचान

1947 में आजादी मिलने के बाद भारतीय मुद्रा में बदलाव की प्रक्रिया शुरू हुई। वर्ष 1949 में स्वतंत्र भारत का पहला एक रुपये का नोट जारी किया गया, जिसमें अशोक स्तंभ को स्थान दिया गया। इस तरह भारतीय नोटों पर देश की अपनी पहचान और प्रतीकों को प्रमुखता मिलने लगी।

वर्ष 1957 में भारत ने दशमलव प्रणाली अपनाई। इसके तहत एक रुपये को 16 आने के बजाय 100 पैसे में बांटा गया। इससे रुपये और पैसे की गणना तथा दैनिक लेनदेन की व्यवस्था में बदलाव आया।

1969 में पहली बार नोट पर दिखे महात्मा गांधी

भारतीय नोटों के इतिहास में महात्मा गांधी की तस्वीर भी एक अहम पड़ाव है। वर्ष 1969 में गांधीजी की जन्मशती के अवसर पर उनकी तस्वीर वाला स्मारक बैंक नोट जारी किया गया। बाद में 1996 से महात्मा गांधी श्रृंखला के तहत सामान्य प्रचलन वाले नोटों पर भी उनकी तस्वीर दिखाई देने लगी।

आज भारतीय बैंक नोटों पर महात्मा गांधी की तस्वीर के साथ विभिन्न सुरक्षा विशेषताएं, भाषाई पैनल और देश की सांस्कृतिक विरासत से जुड़े चित्र देखने को मिलते हैं।

निजी बैंक के वादापत्र से आधुनिक मुद्रा तक का सफर

भारत में कागजी मुद्रा का विकास केवल नोटों के स्वरूप में बदलाव की कहानी नहीं है, बल्कि यह देश की आर्थिक और बैंकिंग व्यवस्था के विकास को भी दर्शाता है। निजी बैंकों के सीमित उपयोग वाले नोटों से शुरू हुआ यह सफर सरकारी मुद्रा, रिजर्व बैंक की व्यवस्था और स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों तक पहुंचा। करीब ढाई सौ साल में भारतीय नोटों ने शासन, अर्थव्यवस्था और देश की पहचान में आए बदलावों को अपने भीतर समेट लिया है।

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