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गुजरात की अनोखी परंपरा: रूपाल की पल्ली पर क्यों चढ़ता है टनों घी? जानें महाभारत से जुड़ी मान्यता

by newzgossip
22 minutes ago
in Khabrein Jara Hat Ke
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गुजरात की अनोखी परंपरा: रूपाल की पल्ली पर क्यों चढ़ता है टनों घी? जानें महाभारत से जुड़ी मान्यता
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गुजरात के गांधीनगर के पास स्थित रूपाल गांव में मां वरदायिनी की पल्ली की अनूठी परंपरा सदियों से श्रद्धा और आस्था का केंद्र बनी हुई है। शारदीय नवरात्रि की महानवमी पर निकलने वाली इस धार्मिक यात्रा की सबसे खास बात है पल्ली पर चढ़ाया जाने वाला शुद्ध घी। मान्यता है कि श्रद्धालु मां वरदायिनी के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करने और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना के लिए घी अर्पित करते हैं। पल्ली के गुजरने के दौरान गांव की गलियों में घी बहने का दृश्य इस परंपरा को देशभर में विशिष्ट पहचान दिलाता है। इस आयोजन में शामिल होने के लिए गुजरात के अलावा देश के दूसरे राज्यों और विदेशों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं।

महाभारत काल से जुड़ी है पल्ली की मान्यता

रूपाल की पल्ली को लेकर कई पौराणिक कथाएं और लोकमान्यताएं प्रचलित हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान मां वरदायिनी की आराधना की थी। कहा जाता है कि उन्होंने अपने अस्त्र-शस्त्र खीजड़े के वृक्ष के नीचे सुरक्षित रखे थे। धार्मिक कथा के मुताबिक, मां के आशीर्वाद से पांडवों ने अपना अज्ञातवास पूरा किया और महाभारत के युद्ध में विजय प्राप्त की।

लोककथाओं में यह भी बताया जाता है कि विजय के बाद पांडवों, भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी ने मां वरदायिनी की पूजा-अर्चना की थी। इसी प्रसंग को पल्ली की परंपरा की शुरुआत से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, ये कथाएं धार्मिक आस्था और लोकविश्वास पर आधारित हैं, इन्हें प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्यों से अलग समझना चाहिए।

पल्ली पर घी चढ़ाने की अनोखी परंपरा

रूपाल की पल्ली की सबसे बड़ी विशेषता इस पर चढ़ाया जाने वाला शुद्ध घी है। श्रद्धालु बड़ी मात्रा में घी लेकर पहुंचते हैं और पल्ली की यात्रा के दौरान उसे अर्पित करते हैं। भक्त इसे मां वरदायिनी के प्रति समर्पण, कृतज्ञता और मनोकामनाओं से जोड़कर देखते हैं।

जैसे-जैसे पल्ली गांव की गलियों से गुजरती है, श्रद्धालु उस पर घी चढ़ाते जाते हैं। बड़ी मात्रा में घी एकत्र होने के कारण कई जगहों पर वह सड़कों पर बहने लगता है। यही अनूठा दृश्य इस धार्मिक आयोजन को दूसरी परंपराओं से अलग पहचान देता है। हालांकि, हर वर्ष चढ़ाए जाने वाले घी की वास्तविक मात्रा अलग-अलग हो सकती है।

खीजड़े की लकड़ी से तैयार होती है पल्ली

पल्ली के निर्माण में भी परंपरागत रीति-रिवाजों का विशेष महत्व है। मान्यता के अनुसार, इसे खीजड़े की लकड़ी से तैयार किया जाता है। पर्यटन संबंधी विवरणों में इसकी ऊंचाई लगभग आठ से नौ फीट बताई जाती है। पल्ली में पांच स्थानों पर पवित्र ज्योत रखने की परंपरा भी प्रचलित है।

महानवमी की रात पल्ली की यात्रा शुरू होती है। मां वरदायिनी के जयकारों और भक्ति गीतों से पूरा गांव भक्तिमय वातावरण में डूब जाता है। परंपरागत मार्ग पर पल्ली 27 स्थानों पर रुकती है। इन स्थानों पर श्रद्धालु मां के दर्शन करते हैं और घी अर्पित कर अपनी आस्था प्रकट करते हैं।

गांव की एकता और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक

रूपाल की पल्ली केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि गांव की सामूहिक आस्था और सामाजिक एकजुटता का भी प्रतीक है। पल्ली की तैयारी से लेकर यात्रा के आयोजन और श्रद्धालुओं की व्यवस्था तक स्थानीय लोगों की भागीदारी महत्वपूर्ण रहती है।

पल्ली के अवसर पर गांव में मेले जैसा माहौल बन जाता है। गलियां और चौक श्रद्धालुओं से भर जाते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा में आज भी बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं। इस तरह यह आयोजन स्थानीय संस्कृति और धार्मिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

धार्मिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र है रूपाल

रूपाल स्थित मां वरदायिनी का मंदिर श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। नवरात्रि के दौरान मंदिर में भक्तों की आवाजाही बढ़ जाती है। महानवमी पर निकलने वाली पल्ली के कारण गांव में विशेष रौनक रहती है।

पांडवों से जुड़ी पौराणिक मान्यता, खीजड़े की लकड़ी से बनी पल्ली, पांच पवित्र ज्योत और शुद्ध घी अर्पित करने की परंपरा इस आयोजन को गुजरात की विशिष्ट धार्मिक विरासत बनाती हैं। देश-विदेश से श्रद्धालुओं का यहां पहुंचना रूपाल के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को दर्शाता है।

रूपाल की पल्ली आज भी आस्था, लोकविश्वास और सामूहिक सहभागिता की जीवंत मिसाल है। मां वरदायिनी के जयकारों के बीच निकलने वाली यह यात्रा गुजरात की उन परंपराओं में शामिल है, जो धार्मिक विश्वास के साथ-साथ स्थानीय संस्कृति और पहचान को भी जीवित रखती हैं।

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