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Home Khabrein Jara Hat Ke

बाबा बर्फानी से जुड़े रोचक रहस्य…..पढ़कर आप हो जाएंगे भौंचक्के

by newzgossip
2 years ago
in Khabrein Jara Hat Ke
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बाबा बर्फानी से जुड़े रोचक रहस्य…..पढ़कर आप हो जाएंगे भौंचक्के
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करोड़ों शिव भक्तों की आस्था के साथ जुड़ी पावन श्री अमरनाथ यात्रा आधिकारिक रूप से 29 जून 2024 से प्रारंभ होने जा रही है। कश्मीर घाटी में स्थित श्री अमरनाथ स्वामी की पवित्र गुफा में प्रतिवर्ष बर्फ से बनने वाले प्राकृतिक हिमशिवलिंग की पूजा की जाती है। महादेव प्रति वर्ष श्री अमरनाथ गुफा में अपने भक्तों को हिमशिवलिंग के रूप में दर्शन देते हैं। इस पवित्र गुफा में हिमशिवलिंग के साथ ही एक गणेश पीठ, एक पार्वती पीठ भी हिम से प्राकृतिक रूप में निर्मित होती है। पार्वती पीठ ही शक्तिपीठ स्थल है।

श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को बाबा बर्फानी अमरनाथ स्वामी के दर्शन के साथ-साथ माता पार्वती शक्तिपीठ का भी दर्शन होता है। यहां माता सती के अंग तथा अंगभूषण की पूजा होती है क्योंकि यहां उनके कंठ का निपात हुआ था।

श्री अमरनाथ की पवित्र गुफा में भगवान शंकर ने शिव धाम की प्राप्ति करवाने वाली परम पवित्र ‘अमर कथा’ माता पार्वती को सुनाई थी। जब भगवान शंकर यह कथा पार्वती जी को सुना रहे थे, तब वहां एक तोते का बच्चा भी इस कथा को सुन रहा था और इसे सुनकर फिर उस तोते के बच्चे ने श्री शुकदेव स्वरूप पाया था।

‘शुक’ संस्कृत में तोते को कहते हैं और इसी कारण बाद में फिर मुनि ‘शुकदेव’ के नाम से संसार में प्रसिद्ध हुए। यह कथा भगवती पार्वती तथा भगवान शंकर का संवाद है। लोक व परलोक का सुख देने वाले शंकर भगवान और पार्वती जी के इस संवाद का वर्णन भृगु संहिता, नीलमत पुराण, तीर्थ संग्रह आदि ग्रंथों में पाया जाता है।

इस पवित्र गुफा की खोज बहुत ही नेक और दयालु मुसलमान गडरिए बूटा मलिक ने की थी। वह एक दिन अपनी भेड़ों को चराते-चराते बहुत दूर निकल गया। एक जंगल में पहुंच कर उसकी एक साधु से भेंट हो गई। साधु ने बूटा मलिक को कोयले से भरी एक कांगड़ी दी। घर पहुंचकर बूटा मलिक ने कोयले की जगह सोना पाया, तब वह बहुत हैरान हुआ। उसी समय वह साधु का धन्यवाद करने के लिए लौटा परंतु वहां साधु की बजाय एक विशाल गुफा देखी। उसी दिन से यह स्थान एक तीर्थ बन गया। आज भी यात्रा पर आने वाले शिव भक्तों द्वारा चढ़ाए गए चढ़ावे का एक निश्चित हिस्सा मलिक परिवार के वंशजों को जाता है।

एक अन्य कथा के अनुसार कश्यप ऋषि ने कश्मीर घाटी के पानी का निष्कासन किया। कश्मीर घाटी उस समय एक बहुत बड़ी झील मानी जाती थी। जब लोगों को इसका ज्ञान हुआ तब वे इस शिव स्थल की तीर्थ यात्रा पर आने लगे। कश्यप ऋषि द्वारा अस्तित्व में आने के कारण से ही इस घाटी का नाम कच्छप घाटी पड़ा जो बाद में कश्मीर घाटी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

एक बार देवर्षि नारद कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर के स्थान पर दर्शनार्थ पधारे। भगवान शंकर उस समय वन विहार के लिए गए हुए थे और भगवती पार्वती यहां विराजमान थीं। पार्वती जी ने देवर्षि को आसन देकर कहा, ‘‘देवर्षि! कृपा अपने आने का कारण कहिए। देवर्षि बोले, ‘‘देवी! भगवान शंकर के गले में मुंड माला क्यों है?’’

भगवान शंकर के वहां आने पर यही प्रश्र माता पार्वती ने भोलेनाथ से किया। उन्होंने कहा, ‘‘जितनी बार तुम्हारा जन्म हुआ है उतने ही मुंड मैंने धारण किए हैं।’’

पार्वती जी बोलीं, ‘‘मेरा शरीर नाशवान है, परंतु आप अमर हैं इसका कारण बताएं।’’

भगवान शंकर ने कहा यह सब अमरकथा के कारण है। यह उत्तर सुनकर माता पार्वती के हृदय में भी अमरत्व प्राप्त करने की भावना पैदा हो गई और वह भगवान शंकर से शिव कथा सुनाने का आग्रह करने लगीं। शिव शंकर ने बहुत वर्षों तक इसे टालने का प्रयत्न किया, परंतु पार्वती जी के हठ के कारण उन्हें अमरकथा सुनाने को बाध्य होना पड़ा। अमरकथा सुनाने के लिए समस्या यह थी कि कोई अन्य जीव उस कथा को न सुने। इसलिए भगवान शंकर पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, वायु, आकाश और अग्नि) का परित्याग करके इन पर्वतमालाओं में पहुंच गए और श्री अमरनाथ गुफा में पार्वती जी को अमरकथा सुनाई।

गुफा की ओर जाते हुए वह सर्वप्रथम पहलगाम पहुंचे जहां उन्होंने अपने नंदी (बैल) का परित्याग किया। फिर चंदनबाड़ी में भगवान शिव ने अपनी जटाओं (केशों) से चंद्रमा को मुक्त किया। शेषनाग नामक झील पर पहुंचकर उन्होंने अपने गले से सर्पों को भी उतार दिया। श्री गणेश जी को भी उन्होंने महागुनस पर्वत पर छोड़ देने का निश्चय किया। फिर पंचतरणी पहुंच कर शिव जी ने पांचों तत्वों का परित्याग किया। सब कुछ छोड़-अंत में भगवान शिव ने इस गुफा में प्रवेश किया और पार्वती जी को अपने श्रीमुख से अमरकथा सुनाई।

इस यात्रा में श्रद्धालुओं की प्रति वर्ष बढ़ रही संख्या को देखते हुए श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड ने यात्रा की अवधि बढ़ा दी है। इस वर्ष श्राइन बोर्ड यह यात्रा 1 जुलाई से लेकर 31 अगस्त (रक्षाबंधन) वाले दिन तक चलाने जा रहा है। प्रतिकूल मौसम के बावजूद बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए प्रति वर्ष श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। एक दंत कथा के अनुसार रक्षाबंधन की पूर्णिमा के दिन भगवान शंकर स्वयं श्री अमरनाथ गुफा में पधारते हैं। ऐसी मान्यता है कि चातुर्मास की प्रतिपदा को हिम के लिंग का निर्माण स्वयं आरंभ होता है और धीरे-धीरे लिंग का आकार धारण कर लेता है तथा पूर्णिमा के दिन पूर्ण हो जाता है व अगले दिन से घटने लगता है।

अमावस्या या शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को यह लिंग पूर्णत: अदृश्य हो जाता है और इस प्रकार यह क्रम निरंतर चलता रहता है। यह हिम शिवलिंग कभी भी पूर्णत: लुप्त नहीं होता, आकार अवश्य ही छोटा-बड़ा हो जाता है। भगवान शिव इस गुफा में पहले पहल श्रावण की पूर्णिमा को आए थे इसलिए उस दिन को श्री अमरनाथ की यात्रा को विशेष महत्व मिला। रक्षाबंधन की पूर्णिमा के दिन ही छड़ी मुबारक भी गुफा में बने ‘हिमशिवलिंग’ के पास स्थापित कर दी जाती है।

श्री अमरनाथ गुफा में बर्फ से बने शिवलिंग से जुड़ी इस कथा को सुनाने के लिए माता पार्वती जी भगवान सदाशिव से कहती हैं, ‘‘प्रभो! मैं अमरेश महादेव की कथा सुनना चाहती हूं। मैं यह भी जानना चाहती हूं कि महादेव गुफा में स्थित होकर अमरेश क्यों और कैसे कहलाए?’’

सदाशिव भोलेनाथ माता पार्वती का प्रश्र सुनकर कहने लगे आदिकाल में ब्रह्मा, प्रकृति, अहंकार, स्थावर (पर्वतादि) जंगल (मनुष्य) संसार की उत्पत्ति हुई। इस क्रमानुसार देवता, ऋषि, पितर, गंधर्व, राक्षस, सर्प, यक्ष, भूतगण, कूष्मांड, भैरव, गीदड़, दानव आदि की उत्पत्ति हुई। इस तरह नए प्रकार के भूतों की सृष्टि हुई परंतु इंद्र आदि देवता सहित सभी मृत्यु के वश में थे।

देवता, भगवान सदाशिव के पास आए क्योंकि उन्हें मृत्यु का भय था। भय से त्रस्त सभी देवताओं ने भगवान भोलेनाथ की स्तुति की और कहा हमें मृत्यु बाधा करती है। आप कोई ऐसा उपाय बतलाएं जिससे मृत्यु हम लोगों को बाधा न करे। देवताओं की बात सुनकर भोलेनाथ स्वामी बोले मैं आप लोगों की मृत्यु के भय से रक्षा करूंगा। यह कहते हुए सदाशिव ने अपने सिर पर से चंद्रमा की कला को उतार कर निचोड़ा और देवगणों से बोले, यह आप लोगों के मृत्यु रोग की औषधि है।

उस चंद्रकला के निचोडऩे से पवित्र अमृत की धारा बह निकली और वह धारा बाद में अमरावती नदी के नाम से विख्यात हुई। चंद्रकला को निचोड़ते समय भगवान सदाशिव के शरीर पर जो अमृत बिंदु गिरे वे सूख कर पृथ्वी पर गिर पड़े। पावन गुफा में जो भस्म है वह इसी अमृत बिंदु के कण हैं।

कहते हैं सदाशिव भगवान देवताओं पर प्रेम न्यौछावर करते समय स्वयं द्रवीभूत हो गए। देवगण सदाशिव को जल स्वरूप देख कर उनकी स्तुति में लीन हो गए और बारम्बार नमस्कार करने लगे। भोलेनाथ ने दयायुक्त वाणी से देवताओं से कहा, तुमने मेरा बर्फ का लिंग शरीर इस गुफा में देखा है। इस कारण मेरी कृपा से आप लोगों को मृत्यु का भय नहीं रहेगा। अब तुम यहीं पर अमर होकर शिव रूप को प्राप्त हो जाओ। आज से मेरा यह अनादिलिंग शरीर तीनों लोकों में अमरेश के नाम से विख्यात होगा।

भगवान सदाशिव देवताओं को ऐसा वर देकर उस दिन से लीन होकर गुफा में रहने लगे। भगवान सदाशिव महाराज ने अमृत रूप सोमकला को धारण करके देवताओं की मृत्यु का नाश किया इसलिए तभी से उनका नाम अमरेश्वर प्रसिद्ध हुआ है।

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