हिंदू धर्म में कार्तिक मास का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। इस महीने की अमावस्या को कार्तिक अमावस्या कहा जाता है। यह तिथि दीपावली के पर्व से भी जुड़ी है। कार्तिक मास में भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व बताया गया है। इसी महीने भगवान श्रीकृष्ण की एक ऐसी बाल लीला का स्मरण भी किया जाता है, जिसने भक्तों को प्रेम और भक्ति का अनोखा संदेश दिया। यह कथा है मां यशोदा और बाल गोपाल की, जिसमें भगवान को बांधने के लिए मां की रस्सी बार-बार छोटी पड़ जाती थी।
जब मां यशोदा ने कान्हा को बांधने का किया प्रयास
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक दिन गोकुल में मां यशोदा घर के कामों में व्यस्त थीं। उनका लाडला कान्हा अपनी शरारतों से पूरे घर को परेशान कर रहा था। कभी माखन चुराना तो कभी मटकी फोड़ना उसकी रोजमर्रा की बाल लीलाओं का हिस्सा था।
एक दिन श्रीकृष्ण ने माखन की मटकी फोड़ दी और घर में खूब शरारत की। जब मां यशोदा को इसका पता चला तो उन्होंने कान्हा को सबक सिखाने का फैसला किया। वे श्रीकृष्ण को पकड़कर एक ओखली से बांधने लगीं, ताकि वह कुछ देर शांत बैठें।
लेकिन यहां एक अद्भुत घटना हुई। मां यशोदा ने जिस रस्सी से कान्हा को बांधना चाहा, वह हर बार दो अंगुल छोटी पड़ जाती थी।
हर बार दो अंगुल छोटी पड़ जाती थी रस्सी
मां यशोदा ने पहले एक रस्सी लाई और उससे कान्हा को बांधने की कोशिश की, लेकिन वह छोटी पड़ गई। इसके बाद उन्होंने दूसरी रस्सी जोड़ दी। इसके बावजूद रस्सी फिर दो अंगुल छोटी रह गई।
मां यशोदा ने हार नहीं मानी। वे घर में रखी दूसरी रस्सियां भी लाती रहीं और उन्हें जोड़ती रहीं। लेकिन हर बार परिणाम एक जैसा ही रहा। रस्सी कितनी भी लंबी हो जाती, वह कान्हा को बांधने के लिए छोटी पड़ जाती।
यह देखकर घर की दूसरी महिलाएं भी हैरान रह गईं। आखिरकार मां यशोदा थक गईं। उनके चेहरे पर पसीना आ गया और बाल बिखर गए। मां की इस मेहनत और निश्छल प्रेम को देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं को बंधने दिया।
भगवान को बांधने के पीछे छिपा है दो अंगुल का रहस्य
धार्मिक मान्यताओं में इस कथा को भगवान की दामोदर लीला कहा जाता है। दामोदर नाम का अर्थ है वह, जिनके उदर यानी पेट पर रस्सी का बंधन हो।
इस कथा में बार-बार रस्सी का दो अंगुल छोटी पड़ना भी प्रतीकात्मक माना जाता है। भक्तिभाव से जुड़ी एक प्रचलित व्याख्या के अनुसार, ये दो अंगुल दो बातों का प्रतीक हैं।
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पहली अंगुल: भक्त की सच्ची मेहनत, प्रेम और समर्पण।
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दूसरी अंगुल: भगवान की कृपा।









