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Home Khabrein Jara Hat Ke

सवा महीने तक स्त्रियों से दूर रहता है ये समुदाय, वजह कर देगी हैरान

by newzgossip
3 years ago
in Khabrein Jara Hat Ke, भारत
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सवा महीने तक स्त्रियों से दूर रहता है ये समुदाय, वजह कर देगी हैरान
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Rajasthan News: स्त्री और पुरुष के बीच का संबंध घी और आग के समान होता हैं. लेकिन क्या आपको पता है एक समुदाय ऐसा भी है जो 1 या 2 दिन नदीं पूरे सवा महीने यानी 45 दिन तक स्त्रियों से दूरी बनाये रखते है. ये समुदाय स्त्रियों के शक्ल तक नहीं देखते है सवा महीने तक हरी सब्जी, मांस मदिरा से भी दूरी बनाये रहते हैं. इतना हीं नहीं घर से निकले के बाद सवा महीने तक अपने घर को त्याग देते है. इस दौरान यह सभी सवा महीने तक जूते-चप्पल तक नहीं पहनते हैं।

45 दिन तक स्त्रियों से रहते है दूर
दरअसल मेवाड़ में भील समुदाय द्वारा इन दिनों जगह जगह पर बड़े पैमाने पर गवरी लोकनाट्यों का मंचन किया जा रहा है. ये गवरी लोक नाट्य आगामी अश्विन माह की नवमीं तक पूरे 40 दिन तक अभिनीत किए जाएंगे. भील समुदाय द्वारा मंचित ये लोकनाट्य उनका धार्मिक लोकानुष्ठान है. गवरी लोक नाट्य मंचित करने वालों को खेल्ये कहा जाता है।

सवा महीने के दौरान हरी सब्जी, मांस-मदिरा तक छूते नहीं
सबसे खास बात यह है कि गवरी लोक नाट्य मंचन करने वाले खेल्ये पूरा सवा महीना व्रत रखते हैं और केवल एक समय भोजन करते हैं. इतना ही नहीं इस सवा महीने के दौरान हरी सब्जी, मांस-मदिरा और स्त्रियों से दूर रहते हैं और तो और पैर में जूते चप्पल तक नहीं पहनते हैं. गवरी करने वाले ये प्रमुख खेल्ये एक बार घर से बाहर निकलने के बाद पूरे सवा महीने तक अपने अपने घर भी नहीं जाते हैं.

अलग अलग गांवों में जाते हैं भील समुदाय के सदस्य
गवरी लोकनाट्य में एक गांव का गवरी दल केवल अपने गांव में ही नहीं नाचता है, बल्कि हर दिन उस अन्य गांव में जाता है, जहां उनके गांव की बहन-बेटी ब्याही गई है. नृत्य के अंत में गवरी को न्यौतने वाली बहन- बेटी उन्हें भोजन कराती है और कपड़े भेंट करती है, जिसे पहरावणी कहते हैं. कई बार जिस बहन-बेटी के गांव में गवरी खेली जाती है, उस गांव में सभी मिलकर भोजन एवं पहरावणी का बंदोवस्त करते हैं. भील समुदाय का यह लोकनाट्य नहीं बल्कि धार्मिक लोकानुष्ठान है।

राजस्थान की गवरी लोकनाट्य अनूठी परंपरा
राजस्थान की समृद्ध लोक परंपराओं में गवरी लोकनाट्य की अनूठी परंपरा है, जो सैकड़ों वर्षों से प्रतिवर्ष नियमित रूप से मनाई जाती है. जानकारी के अनुसार भील समाज की मान्यता है कि भगवान शिव उनके दामाद हैं और गौरजा अर्थात् पार्वती बहन-बेटी हैं. गवरी लोक नाट्य के लिए दल का गठन करते समय कलाकारों के लिए कपड़ों, गहनों और साज सज्जा आदि पर आने वाले खर्च को पूरे गांव के सभी जातियों के लोग मिल-जुल कर वहन करते हैं. प्रमुख खेल्ये जिस पात्र का अभिनय करते हैं, अक्सर वे हर समय उसी वेशभूषा में रहते हैं. गवरी का आयोजन शहर एवं गांव के अलग-अलग स्थानों पर सुबह से रात तक चलता है और एक टीम में कम से कम 40 से 45 सदस्य होते हैं, जिसमें बच्चे भी शामिल होते हैं।

टीम में 40 से 45 लोग होते हैं
गवरी के मुख्य खेलों में कान्ह गुजरी, कालू कीर, बणजारा, मीणा, नाहरसिंही, नाहर, कालका देवी, कालबेलिया, रोई माछला, सूर सूरडी, भंवरा-दानव, वडल्या हिंदवा, कंजर-कंजरी, नौरतां, हरिया-अंबाव, खेतूड़ी एवं बादशाह की सवारी जैसे कई खेल आकर्षण का केंद्र होते हैं. राजसमंद जिला मुख्यालय के मुखर्जी चौराहे के पास कुमावत समाज के नोहरे में भी मेवाड़ का प्रसिद्ध लोक नृत्य गवरी का मंचन हुआ. गवरी देखने सुबह से शाम तक दर्शकों की भीड़ जुटी रही तो वहीं गवरी के कलाकार भी भीड़ को देखकर खेल में और उत्साह बढ़ गया एवं लगातार अलग-अलग नाटक का मंचन करते रहे।

अलग-अलग गांव में जाकर गवरी नृत्य करते है
जानकारी के अनुसार गवरी का मंचन के लिए किसी गांव में गवरी के कलाकारों को चयन कर नृत्य के लिए तैयार किए जाते हैं एवं उनकी सुविधा अनुसार यह गवरी करीब सवा महीने तक अलग-अलग गांव में जाकर गवरी नृत्य-खेल करते हैं. गवरी लेने वाले गांव की बहन बेटी जिस जिस गांव में ब्याही जाती है उस उस गांव में यह गवरी के कलाकार नाचते हैं एवं वहां की बहन बेटियां एवं समाज के लोग गवरी के कलाकारों का खर्चा उठाते हैं. इस संदर्भ में कुमावत समाज के नैनचंद कुमावत से बात की गई तो उन्होंने बताया कि कुमावत समाज के नोहर में मेवाड़ का प्रसिद्ध लोक नृत्य गवरी का नृत्य हुआ. यह गवरी रेलमंगरा के समीप मऊ गांव से यहां बुलावे पर आई है।

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