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कनॉट प्लेस का सेंट्रल पार्क: कभी था घना जंगल, जानिए तिरंगा मार्च विवाद के बीच इसका 100 साल पुराना इतिहास

by newzgossip
22 minutes ago
in Khabrein Jara Hat Ke
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कनॉट प्लेस का सेंट्रल पार्क: कभी था घना जंगल, जानिए तिरंगा मार्च विवाद के बीच इसका 100 साल पुराना इतिहास
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देश की राजधानी दिल्ली का मशहूर कनॉट प्लेस एक बार फिर सेंट्रल पार्क में प्रस्तावित तिरंगा मार्च को लेकर चर्चा में आया। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने 16 अक्टूबर को यहां ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च का आह्वान किया था। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की और प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की। पुलिस ने दिपके को मार्च में शामिल होने से रोकने के लिए नोटिस दिया और बाद में उन्हें हिरासत में ले लिया। इस घटनाक्रम के बीच कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क का इतिहास भी चर्चा का विषय बन गया है।

आज कनॉट प्लेस के बीचोंबीच स्थित सेंट्रल पार्क हरियाली, खुले स्थान और राष्ट्रीय ध्वज के लिए जाना जाता है। लेकिन करीब एक सदी पहले इस इलाके की तस्वीर बिल्कुल अलग थी। जहां आज बाजार, दफ्तर, मेट्रो स्टेशन और बड़ी-बड़ी इमारतें नजर आती हैं, वहां कभी झाड़ियों और पेड़-पौधों से घिरा ग्रामीण इलाका हुआ करता था।

कभी जंगल और गांवों से घिरा था यह इलाका

20वीं सदी की शुरुआत में कनॉट प्लेस और आसपास के क्षेत्रों में बबूल, रोंझ, केर, खजूर और सांगरी जैसे पेड़-पौधे पाए जाते थे। इस इलाके में जयसिंहपुरा और राजा का बाजार जैसे गांव भी बसे हुए थे। बताया जाता है कि जयसिंहपुरा की जमीन पर जयपुर के शासकों का अधिकार था।

उस समय पुरानी दिल्ली यानी शाहजहांनाबाद के लोग इस क्षेत्र में धार्मिक स्थलों पर जाने और आसपास के खुले इलाकों में घूमने के लिए आते थे। आज की व्यस्त सड़कों और व्यावसायिक इमारतों की जगह तब ग्रामीण परिवेश और प्राकृतिक वनस्पति का प्रभाव था।

1912 के बाद शुरू हुआ दिल्ली के विस्तार का दौर

नई दिल्ली के विकास की योजनाओं के साथ इस क्षेत्र में बदलाव की प्रक्रिया तेज हुई। वर्ष 1912 के बाद शहरी विस्तार के लिए जमीनों के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई। जयसिंहपुरा जैसे गांवों की जमीन भी इस बदलाव का हिस्सा बनी। लंबे समय तक चली प्रशासनिक प्रक्रिया के बाद यहां के ग्रामीण इलाकों का स्वरूप बदलने लगा और विस्थापित परिवारों को करोल बाग तथा पहाड़गंज जैसे क्षेत्रों में बसाया गया।

इसके बाद इस क्षेत्र को एक बड़े व्यावसायिक केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना बनाई गई। धीरे-धीरे कनॉट प्लेस ने दिल्ली के प्रमुख बाजारों में अपनी जगह बना ली।

प्रिंस ऑफ कनॉट के नाम पर पड़ा कनॉट प्लेस

कनॉट प्लेस का नाम ब्रिटिश शाही परिवार के सदस्य प्रिंस आर्थर, ड्यूक ऑफ कनॉट एंड स्ट्रैथर्न के नाम पर रखा गया था। इस बाजार का निर्माण 1929 के आसपास शुरू हुआ और 1930 के दशक में यह प्रमुख व्यावसायिक केंद्र के रूप में उभरा।

अपनी जॉर्जियन शैली की इमारतों, गोलाकार बाजार संरचना और दुकानों के कारण कनॉट प्लेस ने अलग पहचान बनाई। यहां किताबों की दुकानों, कॉफी हाउस और प्रसिद्ध प्रतिष्ठानों ने इसे दिल्ली के सामाजिक और व्यावसायिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया।

सेंट्रल पार्क के नीचे बना पालिका बाजार और मेट्रो स्टेशन

कनॉट प्लेस के बीच स्थित सेंट्रल पार्क लंबे समय से लोगों के मिलने-जुलने और आराम करने की जगह रहा है। समय के साथ इस क्षेत्र के नीचे भी बड़े निर्माण हुए। यहां भूमिगत पालिका बाजार विकसित किया गया और बाद में राजीव चौक मेट्रो स्टेशन ने इसे दिल्ली के सार्वजनिक परिवहन के सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में शामिल कर दिया।

दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (डीएमआरसी) ने मेट्रो परियोजना के तहत इस क्षेत्र का पुनर्विकास किया। मेट्रो निर्माण के बाद पार्क को आधुनिक स्वरूप दिया गया और दिसंबर 2006 में इसे नई दिल्ली नगर परिषद (एनडीएमसी) को सौंप दिया गया। इसके बाद सेंट्रल पार्क आम लोगों के लिए एक आकर्षक सार्वजनिक स्थल के रूप में विकसित हुआ।

27 हजार वर्ग मीटर में फैली है हरियाली

एनडीएमसी की परियोजना रिपोर्ट के अनुसार, सेंट्रल पार्क में लगभग 27,000 वर्ग मीटर क्षेत्र में घास और हरियाली विकसित की गई। यहां सफेद चंपा, रॉयल पाम, गुलमोहर और अशोक सहित कई प्रजातियों के पेड़-पौधे लगाए गए। पार्क में चार जल निकाय और 21 फव्वारे भी बनाए गए, जो इसकी सुंदरता बढ़ाते हैं।

यहां बना एम्फीथिएटर सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सार्वजनिक गतिविधियों के लिए उपयोगी स्थान है। राजीव चौक मेट्रो स्टेशन से इसकी नजदीकी के कारण रोजाना बड़ी संख्या में लोग इस इलाके से गुजरते हैं। स्थानीय लोगों के साथ-साथ दिल्ली घूमने आने वाले पर्यटकों के लिए भी यह लोकप्रिय स्थान है।

तिरंगा मार्च के कारण फिर चर्चा में आया पार्क

अक्टूबर 2026 में सेंट्रल पार्क उस समय चर्चा में आया, जब सीजेपी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और अपने नेताओं की हिरासत के विरोध में ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च का आह्वान किया। दिल्ली पुलिस ने क्षेत्र में लागू प्रतिबंधों और बिना अनुमति सभा आयोजित किए जाने की आशंका का हवाला देते हुए कार्रवाई की। 16 अक्टूबर को प्रदर्शन के दौरान कई लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबरें भी सामने आईं। बाद में दिपके को सशर्त जमानत मिलने की जानकारी दी गई।

यह घटनाक्रम एक बार फिर सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शन, प्रशासनिक प्रतिबंधों और नागरिक अधिकारों से जुड़े सवालों को चर्चा में ले आया।

कनॉट प्लेस का सेंट्रल पार्क आज केवल हरियाली से घिरा मनोरंजन स्थल नहीं है, बल्कि दिल्ली के बदलते शहरी इतिहास का भी प्रतीक है। कभी गांवों और झाड़ियों से घिरे इस इलाके का आधुनिक बाजार और मेट्रो केंद्र में बदलना राजधानी के विकास की लंबी कहानी बयां करता है।

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