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दूधेश्वरनाथ महादेव मंदिर परिसर के कुएं का पानी बदलता है रंग, रावण से जुड़ी है मान्यता

by newzgossip
15 minutes ago
in धर्म
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दूधेश्वरनाथ महादेव मंदिर परिसर के कुएं का पानी बदलता है रंग, रावण से जुड़ी है मान्यता
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भगवान शिव की पूजा अर्चना के लिए यूं तो देशभर के हर मंदिर में भक्तों की आस्था होती है, लेकिन दिल्ली-एनसीआर में एक ऐसा प्राचीन मंदिर है, जिस की मान्यता ना सिर्फ प्राचीन काल से चली आ रही है, बल्कि इससे जुड़ी हुई पौराणिक बातें इस मंदिर के बारे में जानने के लिए और जिज्ञासा उत्पन्न करती हैं. आज हम आपको प्राचीन दूधेश्वर नाथ मंदिर के बारे में बताने वाले हैं. कहा जाता है कि इस मंदिर में रावण और ऋषि विश्रवा ने भी पूजा-अर्चना की थी.

मान्यता है कि यह धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और चमत्कारों का अद्भुत संगम है। लंकापति रावण के काल से जुड़ी कथाओं, स्वयंभू शिवलिंग की दिव्यता और चमत्कारी कुएं की अनोखी मान्यताओं के कारण यह स्थल शिवभक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है। महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर यहां की छटा देखते ही बनती है—दूध, बेलपत्र और गंगाजल से हो रहा अभिषेक, भजनों की गूंज और भक्तों की अटूट श्रद्धा इस धाम को और भी दिव्य बना देती है।

प्राचीनता और पौराणिक मान्यता
दूधेश्वरनाथ महादेव को भगवान शिव के प्राचीनतम स्थलों में से एक माना जाता है। लोकमान्यताओं के अनुसार, यह स्थान लंकापति रावण के काल से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि महर्षि पुलस्त्य के पुत्र और रावण के पिता विश्वश्रवा ने यहां कठोर तपस्या की थी। स्वयं रावण ने भी इस पवित्र भूमि पर भगवान शिव की आराधना की थी।

प्राचीन ग्रंथों में वर्णित हरनंदी नदी, जिसे आज हिंडन नदी के नाम से जाना जाता है, इसी क्षेत्र से प्रवाहित होती है। मंदिर परिसर में प्रतिष्ठित हिरण्यगर्भ ज्योतिर्लिंग स्वयंभू रूप में लगभग साढ़े तीन फीट नीचे विराजमान है, जो इस धाम की दिव्यता को और भी बढ़ाता है।

ऐतिहासिक महत्व
गाजियाबाद के इस भव्य मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार एक ही विशाल पत्थर को काटकर बनाया गया है। उसी पत्थर को तराशकर द्वार के मध्य भगवान गणेश की सुंदर प्रतिमा उकेरी गई है, जो शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण है।

लोक आस्था के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा करवाया गया था। हालांकि इतिहासकारों में इस विषय पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन जनश्रुति इस मंदिर की भव्यता और प्राचीनता को मराठा काल से जोड़ती है।

गाय से जुड़ी अद्भुत कथा
दूधेश्वर महादेव से जुड़ी एक अत्यंत रोचक और श्रद्धा से परिपूर्ण कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि समीप स्थित कैला गांव की गायें प्रतिदिन चरते-चरते एक टीले पर पहुंच जाती थीं। वहां पहुंचते ही उनके थनों से अपने आप दूध बहने लगता था।

इस अद्भुत घटना से चकित ग्रामीणों ने जब उस स्थान की खुदाई कराई, तो वहां एक दिव्य शिवलिंग प्रकट हुआ। चूंकि उस स्थान पर गायों के दूध से स्वतः महादेव का अभिषेक होता था, इसलिए इसका नाम “दूधेश्वर” या “दुग्धेश्वर” महादेव पड़ा। आज भी भक्तगण इस कथा को अपार श्रद्धा के साथ स्मरण करते हैं।

चमत्कारी कुएं की आस्था
मंदिर परिसर में स्थित एक प्राचीन कुआं भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है। मान्यता है कि इस कुएं का जल दिन में तीन बार अपना रंग बदलता है। यह कुआं श्री दूधेश्वरनाथ मठ मंदिर के राम भवन में स्थित है।

कुएं के चारों ओर गणेश-लक्ष्मी, अन्नपूर्णा, राधा-कृष्ण सहित अनेक देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित हैं। यहां आने वाले श्रद्धालु पहले भगवान शिव के दर्शन करते हैं और फिर इस दिव्य कुएं की पूजा कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

आस्था का अटूट केंद्र
महाशिवरात्रि के अवसर पर दूधेश्वरनाथ मंदिर की छटा निराली हो उठती है। दूर-दूर से आए श्रद्धालु जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक और बेलपत्र अर्पित कर भगवान शिव को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं। भक्तों का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से अर्जी लगाने मात्र से बिगड़े कार्य भी संवर जाते हैं।

आस्था, इतिहास और पौराणिक मान्यताओं का अद्भुत संगम यह पावन धाम आज भी श्रद्धालुओं के लिए आशा और विश्वास का केंद्र बना हुआ है। “हर-हर महादेव” के जयघोष के साथ यह मंदिर भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से सदैव आलोकित रहता है।

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